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सांँझेदारी

सब जल रहा था आसपास,
पर आग कहीं नहीं थी।
रौशनी इतनी थी कि दिखना बंद हो गया था,
सब रंग बस सफेद बन कर रह गए थे।
तपता सूरज आज प्यासा था,
बस चूसता जा रहा था।
सभी आशाएं दम तोड रही थी।
जीने की लालसा,
मेहनत करने का हौसला,
सब चूस चुका था।
सूरज गरम लू का कौड़ा चला रहा था।
उसकी फटकार से सब दुबक गए थे।
बिलों में, घर में, तो कोई पेड़ो में।
नन्हे पत्ते डर से कॉप रहे थे।
पेड़ का तना आज अकेला ही तना खड़ा था,
विश्वासघाती चौड़े पत्ते, पेड़ की छुपी सुरंग बन गए थे।
पेड़ का पानी दे, सूरज की प्यास बुझाने लगे,
और आखिर सुख कर पेड़ का साथ छोड़ गए।
काटे फिर भी वफादार रक्षक थे, डटे रहे।
समय कठिन था।
जिनसे उम्मेद थे वे साथ छोड़ रहे थे,
और पहले नकारा लगाने वाले
काम आ रहे कर थे।
जीवन दाता सूरज आज शत्रु था।
दूर से सुहाना लगने वाला सूरज,
धरती के पास आने पर, कहर ढा रहा था।

धरती तिलमिला उठी थी,
आपने प्यारे जीवों को कैसे बचाए?
यह जीव और जीवन ही उसकी पहचान थे,
अब आस बस आसमान से थी,
पर वह भी तो अपना नीलापन छोड़,
सफेद पड गया था।
पर ध्यान से देखने पर,
आसमान की सफेदी में कुछ धब्बे थे।
धूमैल से, मटमैले से,
आसमान शायद सुरज की आँख चुरा,
कुछ शरारत कर रहा था।
सूरज ने जब चमक कर फिर आंख दिखाई,
तो हल्की हंसी सा आसमान गरज उठा।
शरारत सामने आ रही थी,
हवा जरा ठंडी हो गई थी।
मटमैला रंग गहराने लगा,
आशाएं आज चमकीला पोशाक छोड़,
धूमैल रंग में, भेस बदल, चुपके से आईं थी।
दुबके हुए जीव, अपनी गर्दन निकाल,
आसमान को ताकने लगे।
सूरज कमजोर पड़ रहा था,
उसके किरणे ताकत खो रही थीं।
ज़रा ज़रा हवा भी बईमानी कर रही थी,
सूरज के हथियार से,
ठंडी पुरवाई में बदल रही थी।
पासा पलट रहा था,
वातावरण बदल रहा था।

अचानक आसमान में कुछ धमाके हुए,
धरती पर चहल पहल हुई,
सूरज आवाक हुआ।
बदलो की बारात जो आ गई थी,
गड़गड़ाती, भीगाती, बिजलियां चमकती।
बारात हमेशा आने वाली खुशियों का संदेश होता है,
नाचना, चहकना, खिलखिलाना तो बनता है।
धरती नाच उठी, जीव चहक उठे,
और पेड़ खिलखिला उठे।
जीवन उत्सव शुरू हुआ।
बादलो ने सूरज को परास्त किया था,
आपने आप में उसे पूरा ढ़क लिया था।
धरती और उसके जीवों को,
सूरज के कहर से मुक्त किया था।
धरती पर सब मदमस्त थे।
आसमान में, सूरज और बादल अब अकेले थे।
मौका देख सूरज बादल के कान में प्यार से बुदबुदाया,
“अब तुम्हारी बारी…
मैंने हताश कर दिया है,
तुम अब आस दो, जीवन दो।
मैं फिर आऊंगा, उन्हे तुम्हारी अहमियत समझाने।”
बादल पलट कर सूरज से मुस्कुरा कर बोले,
“तुम भी तो उनके जीवन दाता हो।”
पर इन्हे ये बताना जरूरी है,
की दुख के बिना, सुख की कोई कीमत नहीं,
और कठनाई के बिना सफलता नहीं।
जो अच्छा है, वह कुछ बुरा भी है,
और जो बुरा है, वहां अच्छाई भी है।
यह समझने और अपनाने का द्वंद उनका है, अपनी तो बस सांँझेदारी है।

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Ar. Snehal Surve

Associate professor at Smt. K. L. Tiwari College of Architecture

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